डोकलाम
इलाके में भारत और चीन की सेना को आमने-सामने खड़े एक महीना होने को आया.
दोनों में से कोई भी सेना पीछे हटने की जल्दी में नहीं. जिस इलाके को चीन
प्राचीन काल से अपना बताकर सड़क बनाने की बात कर रहा है और भारत को पीछे
हटने को कह रहा है, भारत लगातार उसे भूटान का क्षेत्र बताते हुए चीन को
पीछे हटने को कह रहा है. भूटान की जमीन पर भारत का यह रुख इसलिए है क्योंकि
भूटान से उसका रणनीतिक समझौता है जिसके तहत सैन्य मदद उसे मिलती है.
लेकिन ऐसे में लगातार जो सवाल उठ रहे हैं वे यह कि आखिर यह तनाव कम कैसे होगा? कैसे सुलझेगा यह मामला? क्या कूटनीति काम आएगी या अब सीधी लड़ाई का ही रास्ता बचा है? ऐसे में यह जरूरी है कि हम पिछले कुछ सालों में जब जब इस प्रकार का तनाव हुआ है उस पर नजर डालें, और इस बार जो अलग है उस पर भी नजर डालें.
परमाणु शक्ति से लैस देश से चीन भी सीधी लड़ाई चाहेगा ऐसा नहीं है चाहे भारत की तरह उसका 'नो फर्स्ट यूज़' पॉलिसी न हो. हैम्बर्ग में जिस तरह दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की तारीफ की, शुभकामनाएं दीं, जिस तरह भारत के कुछ मंत्री हाल में चीन में थे, जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जुलाई के आखिरी हफ्ते में ब्रिक्स की एक बैठक में भाग लेने चीन जा रहे हैं, लड़ाई की कगार पर खड़े देशों के बीच अक्सर ऐसा होता नहीं. यह मानना भी शायद गलत होगा कि दोनों शीर्ष नेताओं की बातचीत के अलावा कहीं कुछ और बात नहीं हुई होगी, कोई कूटनीतिक कोशिश नहीं हुई होगी. और अगर ऐसा हुआ है तो पिछले उदाहरणों को देखते हुए, शायद चीन की तरफ से कोई न कोई शर्त रखी जाएगी, और फिर धीरे-धीरे एक ही साथ दोनों सेनाएं पीछे हटना शुरू करें.
आसियान देशों के एक लेक्चर में विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों में ऐसी स्थिति से निबटने की परिपक्वता है. दोनों देशों के रिश्ते काले-सफेद की परिभाषा में नहीं देखे जा सकते हैं. उम्मीद यही है कि चीन भी ऐसा ही समझता है, खुलकर बोले न बोले.
कादम्बिनी शर्मा NDTV इंडिया में एंकर और फारेन अफेयर्स एडिटर हैं...
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
Source:-ndtv
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लेकिन ऐसे में लगातार जो सवाल उठ रहे हैं वे यह कि आखिर यह तनाव कम कैसे होगा? कैसे सुलझेगा यह मामला? क्या कूटनीति काम आएगी या अब सीधी लड़ाई का ही रास्ता बचा है? ऐसे में यह जरूरी है कि हम पिछले कुछ सालों में जब जब इस प्रकार का तनाव हुआ है उस पर नजर डालें, और इस बार जो अलग है उस पर भी नजर डालें.
परमाणु शक्ति से लैस देश से चीन भी सीधी लड़ाई चाहेगा ऐसा नहीं है चाहे भारत की तरह उसका 'नो फर्स्ट यूज़' पॉलिसी न हो. हैम्बर्ग में जिस तरह दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की तारीफ की, शुभकामनाएं दीं, जिस तरह भारत के कुछ मंत्री हाल में चीन में थे, जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जुलाई के आखिरी हफ्ते में ब्रिक्स की एक बैठक में भाग लेने चीन जा रहे हैं, लड़ाई की कगार पर खड़े देशों के बीच अक्सर ऐसा होता नहीं. यह मानना भी शायद गलत होगा कि दोनों शीर्ष नेताओं की बातचीत के अलावा कहीं कुछ और बात नहीं हुई होगी, कोई कूटनीतिक कोशिश नहीं हुई होगी. और अगर ऐसा हुआ है तो पिछले उदाहरणों को देखते हुए, शायद चीन की तरफ से कोई न कोई शर्त रखी जाएगी, और फिर धीरे-धीरे एक ही साथ दोनों सेनाएं पीछे हटना शुरू करें.
आसियान देशों के एक लेक्चर में विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों में ऐसी स्थिति से निबटने की परिपक्वता है. दोनों देशों के रिश्ते काले-सफेद की परिभाषा में नहीं देखे जा सकते हैं. उम्मीद यही है कि चीन भी ऐसा ही समझता है, खुलकर बोले न बोले.
कादम्बिनी शर्मा NDTV इंडिया में एंकर और फारेन अफेयर्स एडिटर हैं...
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
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